Saturday, January 31, 2015

इस पर ज़रा ध्यान दीजिये ..!

In some ways, you know, people that don't exist, are much nicer than people that do.
Lewis Carroll (1832-1898)

Friday, January 30, 2015

Fw: Inside of Pyramid


Southern Sacred Walks

Thursday, January 29, 2015

Yoga sadhana..!


Wednesday, January 28, 2015

Electro Masaladosa..!




Monday, January 26, 2015

Vedic Maths..

The Echo of life..


Saturday, January 24, 2015

Atithi devo bhavah ...!






http://kurup-man.podomatic.com/entry/2015-01-24T03_56_20-08_00
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
सवधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।

अछी प्रकार आचरण में लाये हुए 'दूसरोंके' धर्म से " गुणरहित " भी "अपना " धर्म अत्युत्तम हैं और दुसरे का धर्म भय को  देनेवाले हैं।  अपने धर्म में मरना कल्याण कारक हैं।
श्रीमद भगवत गीता :- ३/३५
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मान्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।

श्रीमद भगवत गीता :- १८/४६
अछि तरह आचरण में लाये हुए दुसरे केधर्म से गुणरहित ही अपना धर्मश्रेष्ठ हैं। क्योंकि " स्वभाव ' से नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। 
Why Was Kashi Created?

Friday, January 23, 2015

The Man Who Built a Road through a Mountain...

Thursday, January 22, 2015

कई भाषाएँ सीखने का फायदा होता हैं।

सत्व के द्वारा रज और तम -इन दो दुणों पर विजय प्राप्त कर लेनी चाहिए..1


 सत्त्वं रजस्तम इति गुणा बुद्धेर्न चात्मनः।
सत्त्वेनान्यतमो हन्यात् सत्त्वं सत्त्वेन चैव हि।।
सत्त्वाद धर्मो भवेद् वृद्धत्त् पुंसो मद्भक्तिलक्षणः।
सात्त्विकोपासया सत्त्वं ततो धर्मः प्रवर्तते।।
धर्मो रजस्तमो हन्यात् सत्त्ववृद्धिनुत्तमः।
आशु नश्यति तन्मूलो ह्यधर्म उभये हते।।
आगमो/पः  प्रजा देशः कालः कर्मा च जन्म च।
ध्यानं मंत्रोअथ संस्कारो दशैते गुणहेतवः।।
तत्तत् सात्त्विकमेवैषां  यद यद वृद्धा प्रचक्षते।
निन्दन्ति तामसं तत्तद राजसं  तदुपेक्षितम्।।
सात्त्विकान्येव सेवेत पुमान् सत्त्वविवृद्धये।।
ततो धर्मस्ततो ज्ञान यावत् स्मृतिरपोहनम्।
वेणुसंघर्षजो वह्निर्दग्ध्वा शाम्यति तद्वनम्।।
एवं गुणव्यत्ययजो देहः शाम्यति तत्क्रियः।।

श्रीमद् भागवतं -११ /
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा :- प्रिय उद्धव :- सत्व ,रज ,तम - ये तीनों बुद्धि के गुण  हैं , आत्मा के नहीं। सत्व के द्वारा रज और तम -इन दो  दुणों पर विजय प्राप्त कर लेनी चाहिए। तदनन्तर सत्वगुण की शांत वृत्ति के द्वारा उसकी दया आदि वृत्तियों को भी शांत कर देना चाहिए।  जब सत्त्वगुण के वृद्धि होती हैं , तभी जीव को मेरे भक्तिरूप स्वधर्म की प्राप्ति होती हैं।  निरंतर सात्विक वस्तुवोंका सेवन करने से ही सत्त्वगुण की वृत्ति होती हैं,और तब मेरे भक्तिरूप स्वधर्म में प्रवृत्ति होने लगती हैं।  जिस धर्म के पालनसे सत्त्वगुण की वृत्ति हो , वही सबसे श्रेष्ठ हैं।  वह धर्म रजोगुण और तमोगुण को नष्ट कर देता हैं। जब वे दोनों नष्ट हो जाते हैं ,तब उन्ही के कारण होनेवाला अधर्म भी शीघ्र ही मिट  जाता हैं।  शास्त्र ,जल ,प्रजाजन , देश , समय , कर्म , जन्म , ध्यान ,मंत्र और संस्कार -यह दस वस्तुएं यदिं सात्त्विक हो तो सत्त्वगुण की - राजसिक हो तो रजोगुण की , तामसिक हो तो तमोगुण की वृद्धि करती हैं। जिन में से शास्त्रज्ञ महात्मा जिनकी प्रशंसा करते हैं , वे सात्त्विक हैं ; जिनकी निंदा करते हैं वे तामसिक हैं ,और जिनकी उपेक्षा करते हैं , वे वस्तुएं राजसिक हैं।   अपने आत्मा का साक्षात्कार तथा स्थूल-सूक्ष्म शरीर और उनके कारण तीनों गुणोंकी सत्त्वगुण की वृद्धि केलिए, सात्विक शास्त्र आदि का ही सेवन करें ; क्योंकि उससे धर्म की वृद्धि होती हैं और धर्म के वृद्धि से अन्तःकरण  शुद्ध होकर आत्मतत्त्व का ज्ञान होता हैं।  बासों की रगड़ से आग पैदा होती हैं और वह उनके सारे वन को जलाकर शांत हो जाती हैं।  वैसे ही यह शरीर गुणों के वैषम्य से उत्पन्न हुआ हैं।  विचार द्वारा मन्थन करने पर इससे ज्ञानाग्नि प्रज्वलित होती हैं वह समस्त शरीरों एवं गुणोंको भस्म करके स्वयं भी शांत हो जाती हैं।  



Wednesday, January 21, 2015

The Hungy Fox..!

Tuesday, January 20, 2015

पैर के अंगूठे द्वारा भी शक्तिका संचार होता हैं।


पैर के अंगूठे द्वारा भी शक्तिका संचार होता हैं।   पाँव के अंगूठे में विद्युत सम्प्रेक्षणीय शक्ति होती हैं , यही कारण हैं कि,  अपने वृद्धजनोंके नम्रतापूर्वक चरणस्पर्श करने से जो आशीर्वाद मिलता हैं , उससे व्यक्ति की उन्नति के रस्ते खुलते जाते हैं।  कहते हैं गौदान -गंगादि तीर्थस्नान के पुण्यफल केवल गुरुजनोंके पांवप्रक्षालन एवं चरण वंदन से प्राप्त होता है।  वृद्धजनोंके चरणस्पर्श के पश्चात शरीर में व्यापृत इस शक्ति का संचार एवं विद्युत सम्प्रेक्षणीय शक्ति से अविद्या रुपी अन्धकार नष्ट होता हैं और व्यक्ति उन्नति करता हैं।

Monday, January 19, 2015

Many fine things can be done in a day if you don't always make that day tomorrow....!

Sunday, January 18, 2015

ഇതും ഒരു കഥ ...!

चतुर सखीं  लखि कहा बुझाई।
पहिरावहु जयमाल सुहाई
सुनत जुगल कर माल उठाई।
प्रेम बिबस पहिराई न जाई।

ചതുർ  സഖീം ലഘി കഹാ  ബുഝായി
പഹിരാവഹു ജയ്മാൽ സുഹായി
സുനത് ജുഗല് കർ  മാല്  ഉഠായി
പ്രേം ബിബാസ് പഹിരായി ന ജായി .

ത്രയംബകം വില്ലോടിഞ്ഞു . സീതാ ദേവി ശ്രീരാമ സവിധം ആനയിക്കപ്പെട്ടു . ക്ഷത്രിയ സിംഹങ്ങളുടെ  കഴുത്ത് മാതാ  -പിതാക്കളുടെയും ഗുരുജനങ്ങളുടെയും മുന്നിലലാതെ മറ്റാരുടെയും സമക്ഷം താഴില്ലല്ലോ ..? ബാല മൃഗരാജ സമാനനായ  ശ്രീ രാമന്റെ  ഉയർന്ന ശിരസ്സിൽ വരമാലയണിയിക്കുവാനാകാതെ ഇതികർത്തവ്യമൂഢയായി നിന്നു . പിന്നെയാ  കാതര നയനങ്ങൾ  കൊണ്ട് ലക്ഷ്മണനെ ഒന്നുഴിഞ്ഞു . നിമിഷങ്ങള കൊണ്ട് ലക്ഷ്മണൻ കാര്യം ഗ്രഹിച്ചെടുത്തു . പിന്നെയോട്ടും വൈകിയില്ല . ലക്ഷ്മണൻ സോദര ചരണങ്ങളിലേക്ക്  സാഷ്ടാംഗം വീണു . പ്രിയ സോദരനെ പിടിച്ചുയർത്താനായി  അദ്ദേഹം കുനിഞ്ഞ ലാക്കിന് സീതാദേവി അദ്ദേഹത്തിന്റെ കഴുത്തിൽ വരണമാല്യമണിയിച്ചു.
 
 

Saturday, January 17, 2015

हठ ही सीताजी का कष्ट बने.


एक बार महाराज जनक की पुत्री सीता अपनी सखियों के साथ उद्यान में खेल  रही थी , वहां उन्हें नर और मादा तोते का जोड़ा बैठा दिखाई  दिया।  वे दोनों एक वृक्ष की डाल पर बैठे -बैठे एक बड़ी मनोहर कथा कह रहे थे।  कथा कुछ इस तरह थी। ।
इस पृथ्वी पर श्रीराम नाम से प्रसिद्ध एक बड़ा राजा होंगे।  उनकी महारानी का नाम सीता होगा।  श्रीराम बड़े बलवान और बुद्धिमान होंगे और वे समस्त राजाओंको अपने अधीन कर सीताजी के साथ ग्यारह हज़ार वर्षों तक राज करेंगे।  तोते के मुखसे ऐसी बातें सुनकर सीता ने सोचा कि कहीं ये दोनों मेरे ही जीवन कथा तो नहीं कह रहे हैं? इन्हे पकड़कर क्यों न सभी बातें  पूछूँ ? ऍसा  सोच कर उन्होंने अपने सेवकोंसे कहकर दोनों पक्षियोंको चुपके से पकड़वालिया।  सीता ने उन दोनोंसे कहा कि  तुम दोनों डरो मत , मैं सिर्फ यह जानना चाहती हूँ कि  तुम दोनों कौन हो? कहाँ से आये हो ? राम कौन हैं ?सीता कौन हैं ? तुम्हे यह जानकारी कैसे मिली ? इतने सारे प्रश्न सुन कर दोनों तोते चौक गए।  तब दोनों ने कहा कि वाल्मीकि नाम के प्रसिद्द , बहुत बड़े ऋषि हैं।  हम लोग उन्ही के आश्रम में रहते हैं।  उन्होंने एक बड़े ही सुन्दर काव्य की रचना की हैं , जिसका नाम रामायण है।  उनकी कथा बड़ी ही मनोहरणी हैं।  महर्षि अपने शिष्योंको रामायण पढाते हैं। 
इस तरह तोते सीताजी को रामायण के कथा सुनाने लगे।  कथा सुनने के बाद सीताजी ने कहा कि  तुम जिस जनकनंदिनी बात कर रहे हो वह मैं ही हूँ।  श्रीराम ने मेरे मन को अभी से आकर्षित कर दिया हैं ।  वे  यहाँ आकर जब मुझे वरण करेंगे , तभी मैं तुम्हें छोडूंगी।  इसलिए जब तक श्रीराम नहीं आते , तब तक तुम दोनों यहाँ सुख से रहो और मीठे मीठे फलोंका उपयोग करो। यह बात सुनकर दोनों तोते डर गए।  उन्होंने सीताजी से कहा कि  हम लोग पेड़ों पर रहनेवाले स्वछंद पक्षी हैं और मादा गर्भिणी हैं।  इसलिए उसने कहा ,कि वह अपने बच्चोंको जंगल में ही जन्म देना चाहती हैं। उसने बहुत प्रार्थना की , लेकिन सीताजी नहीं मानी।  इस हठ  के चलते मादा तोते राम -राम का उच्चारण करते हुए अपने प्राण त्याग दिए।  पत्नी के वियोग में नर तोते ने भी अपने प्राण त्याग दिए। 
कहते हैं , सीताजी के विरह दुःख का बीज उसी समय पड  गया था , मादा गर्भिणी तोते प्राण त्याग दिए थे।  इसी बैर का बदला लेने केलिए उस नर तोते ने अयोध्या में धोबी के रूप में जन्म लिया और उसके लांछन के कारण सीताजी को भी गर्भिणी की दशा में श्रीराम से अलग होना पड़ा था।




स्वतंत्रता ही अमृत ,
स्वतंत्रता ही जीवन
परतंत्रता स्वाभिमानियों को
मृत्यु से भी हैं भयावह ।


( श्री कुमारन आशान - ओरु उद्बोधनम् -मणिमाला ) Read more...

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Wednesday, January 14, 2015

Happy Pongal, Lohri and Makar Sankranti to all…!


Robert Louis Balfour Stevenson.
Robert Louis Balfour Stevenson.



Tuesday, January 13, 2015

Happy Lohri Vekheya Sadi Yaari..!

"Lohri ka prakash,
aap ki zindagi ko prakashmayi kar de

Jaise Jaise lohri ki aag tej ho,
vaise vaise hi hamare dukhon ka ant ho"


Monday, January 12, 2015

Stephen King quote...!

"Show me a man or a woman alone and I'll show you a saint. Give me two they will fall in love. Give me three and they will invent the charming thing we call 'society'. Give me four and they will build a pyramid. Give me five and they will make one outcast. Give me six and they will reinvent prejudice . Give me seven and in seven years they will reinvent warfare."

Kulathupuzhayile Balakane.

कुलत्तूप्पुषा जॉय राइड ...!


अर्सों बाद 'पुनलूर' शहर में आ पहुंचा हूँ।  सोचा के, क्यों नहीं 'कुलत्तूप्पुषा 'के अय्यप्पा मंदिर दर्शन कर आऊँ।  इस विख्यात मंदिर दर्शन का अनुभव आज तक नहीं हो पाया था ।फिर मैंने बिलकुल देर नहीं लगाया।  सामने दिखीं, राज्य परिवहन  के बस में जा बैठा।  गाडी चल पड़ी।  मेरा सामनेवाला सीट खाली पड़ा था।  देखते ही देखते, मेरे गाड़ीके एम.आर.ऍफ़. पहियें , दोनों तरफ इतालियन टाइल्स लगे 'करवालूर'*:(fight) fight के स्टॉप पर जा रुकी।  बाजू के खाली सीट पर मुंड-माला धारी ( मुंडू -धोती को कहते हैं )एक स्थानीय सज्जन आकर बैठ गया।  मेरे तरफ कुछ क्षणोंके सूक्ष्मावलोकनके *:-/ confusedपश्चात, ,श्रीमानने बहुत ही आधिकारिक ढंग से मुझसे वार्तालाप आरम्भ किया। कहाँ? आया कहाँ से ? रोजी -रोटी के साधन ?इत्यादि सवालोंसे उसने, मेरी सारी  जन्मकुंडली तक जानने का प्रयास किया। पर  दम्भसे भरे उन सवालोंका, मेरे प्रत्युत्तरोंसे वह तृप्तिमंद नहीं लग रहा था।  अब कुछ क्षणों केलिए जब महाशय चुप हुआ, तो मैंने अतिविनीत भावसे उनसे उनकी नाम पूछ डाला ।  कुछ देर उसने मेरे चेहरे पर अपनी निगाहें टिकाये रखा ,फिर असमंजस भरे अंदाज़ में कहा कि ,उसका नाम 'जॉय ' हैं। लेकिन दोस्तों  मुझे , उसके चेहरे पर अपने नाम   बताते हुए  कोई ' जॉय ' दर्शा ही नहीं तब।  मेरा अगला सवाल उनसे यह था के, गाडी के कुलत्तूप्पुषा पहुँचने में कितने समय लगेंगे ? . इस समय उत्तर बहुत जल्द मिला " यही कहीं ..डेढ़ घंटे"।  जवाब के साथ -साथ, मुझे उसके यह प्रतिसवाल भी सुनाई पड़ा " वहां क्या करने जा रहे हो ...? क्या कोई परिचित से मिलने ...? पर्यटक अय्यप्पा-स्वामी भेष-भूषाधारी मुझको, उसके यह उटपटांग सवाल चकित ही कर दिया। फिर सँभालते हुए जवाब दिया "मंदिर जा रहा हूँ ...भाई.। अब आश्चर्यचकित  'जॉय' ने मुझसे पुछा:- " मंदिर ...? कौनसी मंदिर....?किसकी मंदिर.... ? . यह सवाल सुनते ही ,उससे वार्तालाप जारी रखने का मेरी 'जॉय ' समाप्त हो गया एकाएक मेरी वाचालता मौन रूपधारण कर लिया ।  फिर गाडी 'अंचल 'नामक जगह रुक गयी, और  अपने उतरे चेहरे लिए, 'जॉय' गाडीसे उत्तर कर, नीचे  भीड़ में  समा  गया। 
उस समय अचानक मेरी दॄष्टी अपने सीट के ऊपर,दीवार पर खींचे गए लिखावट पर पड़ी - " विकलांग ".  अब मैंने मन ही मन यह सोचने लगा " आखिर इस समाज में हिजड़ोंको, विकलांग के दर्जा क्यों नहीं ? क्योंकि कुलत्तूप्पुषा, जो केरल के एक विख्यात महामंदिर हैं, जहाँ प्रतिदिन हज़ारों भक्त दर्शन हेतु पहूँच जाते हैं, अन्य प्राँतोंसे भी   , उस मंदिर से, प्राय दस मील दूर रहता स्थानीय व्यक्ति ' जॉय ' , उक्त मंदिर से बिलकुल  अपरिचित एवं नावाकिफ़ था।  क्या आया भाईयों कुछ  समझ ....?
 The Lord Ayyappa Temple at Kulathupuzha near Thenmala in Kollam District of Kerala is an important shrine visited by Ayyappa devotees ..

http://kurup-man.podomatic.com/entry/2015-01-1 

दो :-भनिति मोरी सबगुन रहित बिस्व बिदित गुन  एक।
सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें  बिमल बिबेक।

कबि न होऊँ नहीं बचन प्रबीनु।
सकल कला सब बिद्या हीनु।।
अखर अरध अलंकृति नाना।
छंद  प्रबंध अनेक बिधाना।।
भाव भेद रस भेद अपारा।
कबिद दोष गुन बिबिध प्रकारा।।
कबिद बिबेक एक नहिं मोरें।।
सत्य कहउँ लिखि कागद कोरें।।
छमिहहि वो सज्जन मोरि ढिठाई।
सुनिहहिं बालबचन मन लाई।।
जौ बालक कह तोतरी बाता।
सुनहि मुदित मन पितु अरु माता।।
हसिहहिं कूर कुटिल कुबिचारी।
जे परदूषन भूषनधारी।।
खल परिहास होई हित  मोरा।
काक कहहिं कलकंठ कठोरा।।
भाषा भनिति भोरि मति मोरी।
हसिबे जोग हसे नहिं खोरी।।
गुन अवगुन जानत सब कोई।
जो जेहि भाव नीक तेहि सोई।।
प्रभु पद प्रीति न समुझि नीकी।
तिन्हहि सुनि लागिहि फीकी।।


क्षमस्व.. क्षमस्व ...मम घोर अपराधम् ..!



दो :-भनिति मोरी सबगुन रहित बिस्व बिदित गुन  एक।
सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें  बिमल बिबेक।

कबि न होऊँ नहीं बचन प्रबीनु।
सकल कला सब बिद्या हीनु।।
अखर अरध अलंकृति नाना।
छंद  प्रबंध अनेक बिधाना।।
भाव भेद रस भेद अपारा।
कबिद दोष गुन बिबिध प्रकारा।।
कबिद बिबेक एक नहिं मोरें।।
सत्य कहउँ लिखि कागद कोरें।।
छमिहहि वो सज्जन मोरि ढिठाई।
सुनिहहिं बालबचन मन लाई।।
जौ बालक कह तोतरी बाता।
सुनहि मुदित मन पितु अरु माता।।
हसिहहिं कूर कुटिल कुबिचारी।
जे परदूषन भूषनधारी।।
खल परिहास होई हित  मोरा।
काक कहहिं कलकंठ कठोरा।।
भाषा भनिति भोरि मति मोरी।
हसिबे जोग हसे नहिं खोरी।।
गुन अवगुन जानत सब कोई।
जो जेहि भाव नीक तेहि सोई।।
प्रभु पद प्रीति न समुझि नीकी।
तिन्हहि सुनि लागिहि फीकी।।

Goswami Tulsidas: Find biography, birth history, relationship with Ramcharitmanas and Ramayana, and major works etc. .. 



Saturday, January 10, 2015

Once a victim, always a victim—that's the law!



Wednesday, January 7, 2015

Have a Good day..!




The Leaning Tower is the freestanding bell tower of a cathedral in Pisa, Italy. Though designed to stand upright, Pisa's most famous landmark began leaning soon after construction began in 1173. In 1964, Italy's government enlisted the aid of a multinational task force to prevent the tower from toppling, but the tilt remained so severe that the tower was closed to the public in 1990. After another decade of stabilization efforts, it was reopened in 2001. What first caused it to lean?






Monday, January 5, 2015

A cynic is a man who knows the price of everything and the value of nothing.Oscar Wilde (1854-1900)

Friday, January 2, 2015

New Year message ....!

Thursday, January 1, 2015

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