Thursday, July 31, 2014

It is.....!

  1. "It is easier to get into the enemy's toils than out again...!"
Aesop-( 620 BC- 560 BC)

Wednesday, July 30, 2014

Some hand Mudras to improve your health.. !

This presentation deals with ten important Mudras that can result in amazing health benefits...!






Tuesday, July 29, 2014

Lingashtakam...





Lingashtakam
Dad is my inspiration....!

രജത ലേഖ


 രജത് ദാസെന്ന രാജീവ് ദാസ് ...! നീ ഭ്രാന്തനായിരുന്നില്ല .  സാധാരണക്കാരിൽ സാധാരണക്കാരനായ, ഒരു അസാധാരണ വ്യക്തിയായിരുന്നു  നീ.... ഭ്രാന്തന്മാരുടെ ഇടയിൽപ്പെട്ടുഴറിയ സുബോധവാനായിരുന്നു നീ . ചെന്നായ് ക്കൂട്ടത്തിലകപ്പെട്ട ആട്ടിൻകുട്ടിയായിരുന്നു നീ ...   ഭ്രാന്തനാണ് ... വട്ടനാണ്‌ ... എന്നിങ്ങനെയുള്ള തോന്നൽ  , നിന്റെ മസ്തിഷ്ക്കത്തിൽ കൂടെക്കൂടെ ഓതിത്തന്ന്,  നിനക്കവർ ബുദ്ധിഭ്രമമുണ്ടാക്കിത്തന്നതാണ്.. .! അങ്ങനെ ഏതോ ദുർബ്ബല  നിമിഷത്തിൽ  അസാമാന്യ ധൈര്യശാലിയായിരുന്ന നീ , നിന്നെത്തന്നെ മറന്ന് ചെയ്തുപോയ ആ കടുംകൈ ; നിന്നിലെ നന്മയെ തൊട്ടറിഞ്ഞ എന്നെ, എന്നെന്നും ഇനി വിമ്മിഷ്ടപ്പെടുത്തിക്കൊണ്ടിരിക്കും .
നിന്നെ ഒരുവട്ടം കൂടെ കാണണമെന്ന ലക്ഷ്യത്തോടെയാണ് ഞാനവിടെയെത്തിയത് ....! പക്ഷെ ഇനിയൊരു കൂടിക്കാഴ്ച  ഈ ലോകത്ത് സാധ്യമല്ല എന്ന സത്യം , അതീവ ദുഃഖകരമാണ് . പ്രിയ സുഹൃത്തേ , എന്റെ മേൽ വിലാസം  എവിടെനിന്നോ തപ്പിയെടുത്ത് , നീയെനിക്കെഴുതിയ ആ അസംഖ്യം കത്തുകളാണേ  സത്യം ... നീ ഭ്രാന്തനായിരുന്നില്ല . നിനക്കെതിരെ ഉപയോഗിക്കപ്പെട്ട അതേ  ആയുധം തന്നെയാണിവർ ഇപ്പോൾ    എന്റെ മേലും വർഷിക്കുന്നത് . നീ കടന്നുപോയ ആ ദുർബ്ബല നിമിഷത്തിനായ്ക്കൊണ്ട്  ഞാനും  ഇപ്പോൾ കാത്തിരിക്കുകയാണ് .
 അന്ന് അവർ നിന്നെ സ്കൂളിൽ നിന്ന് പുരത്താക്കുകയായിരുന്നില്ല ,  മറിച്ച് ,സമൂഹത്തിൽ നിന്ന് തന്നെ പുറം തള്ളുകയായിരുന്നു . എല്ലാറ്റിന്റെയും തുടക്കവും ഒടുക്കവും ,എല്ലാംതന്നെ നിന്റെ പാഠശാലതന്നെയായിരുന്നു . എല്ലാറ്റിനുമുപരി ,സുഹൃത്തേ അന്ന്  നിന്റെ തുളഞ്ഞ തലയൊട്ടിയിൽനിന്ന്, ബഹിർഗമിച്ച തലച്ചോറിനു മേമ്പോടിയായ് വിതറപ്പെട്ടത്‌ , നിന്റെ കുലീനതയോടും , തഥാകഥിത സവർണ്ണതയോടുമുള്ള അസൂയ ആയിരുന്നു എന്ന് , എനിക്കിന്ന് നിഃസ്സന്ദേഹം പറയാൻ കഴിയും . നിനക്ക് ഞാൻ നിത്യശാന്തി നേർന്നു കൊള്ളുന്നു . ഓം ശാന്തിഃ ശാന്തിഃ ശാന്തിഃ.

Monday, July 28, 2014

What is Shankh (Conch)...?



Saturday, July 26, 2014

राम -राम क्यों कहूँ ?

 इस युग  कथन ...!
' यस्याति वित्तं स नरः कुलीनः
स पण्डितः स श्रुतवान गुणज्ञ:
स एव वक्ता स च दर्शनीयः
सर्वे गुणाः कांञ्चनमाश्रयन्ति '


" आज के युग में जिस के पास धन हैं , वह अच्छे कुल का माना जाता हैं, वह पंडित हैं , विद्वान है वह गुणवान हैं, वह श्रेष्ठ वक्ता हैं . वह प्रातः दर्शनीय हैं, अतः इस युग में व्यक्ति में नहीं , समस्त गुण धन में है और जिसके पास धन हैं उसके पास ही उपरोक्त सभी विशेषतायें  हैं।"
 राम -राम क्यों कहूँ ?

 एक पंडितजी के पास एक तोता था, वह राम-राम,राम-राम जपता था। बड़ा धार्मिक तोता था!. तोते अक्सर धार्मिक होते हैं। वह तोता सदा राम नाम का चदरिया ओढ़े रहता था। उसकी बड़ी ख्याति थी। पंडितजी के पास एक महिला आती थी। पंडितजी के तोते को देखकर वह भी एक तोता खरीद लायी।मगर वह तोता बड़ा नालायक था। वह गालियाँ बकता था। किसी गलत संगत  में रहा था। वह महिला उसको बहुत राम-राम करवाए, लेकिन वह कहे :- ' ऐसी की तैसी राम-राम की । बुढ़िया  ने कहा :- हद हो गयी। यह तोता किस तरह का तोता हैं?.  बुढ़िया ने पंडितजी से कहा कि:- ' मेरा तोता बिलकुल नालायक हैं और मेरी हालत खराब हैं।
पंडितजी ने कहा :- ' तू ऐसा  कर , तेरे तोते को यहाँ ले आ। तुम्हारा तोता दस-पंद्रह दिन मेरे तोते का सत्संग करले , सब ठीक हो जाएगा मेरा। यह तोता बहुत विद्वान् है।यह तो पिछले जन्मों का भक्त समझो, यह पहुंची हुइ  आत्मा है।
वह तोता बैठा था, बस राम-राम राम-राम जप रह था। उसके  चेहरे पर बड़ा भक्ति-भाव दिखाई पड़ता था। महिला ने सोचा कि शायद पंडितजी ठीक कहते हैं। ले आई अपने तोते को  ।दोनों को एक ही पिंजड़े में बंद कर दिया। पांच-सात दिन के बाद पंडितजी एकदम भागे आये ।
महिला से कहा :- 'ले जा अपना तोता '
महिला ने पुछा :- ' क्या हुआ पंडितजी।।?क्या मेरा तोता भी राम-राम करने लगा?
पंडितजी बोले :- अरे तेरे तोते के चक्कर में आकर मेरे तोते ने भी राम-राम कहना बंद कर दिया। आज सुबह कहा कि :- 'कह भाई राम-राम'।
उसने कहा :- ऐसी की तैसी राम की।
मैं तो खबरा  गया यह सुनकर।
तो मैं ने उस से पुछा :- आज तुम्हे क्या हो गया हैं? इतने दिनों से तो तु राम-राम कहता था।आज ऐसी बाते क्यों कर रहा हैं?
उसने कहा :- 'जिस वजह से जपता था वह मेरी मनोकामना पूर्ण हो गयी। एक प्रेयसी की तलाश थी, यह आ गयी। इसी के लिए राम-राम जप रहा था। अब जब वह आ गई , मेरी इच्छा  पूर्ण हो गई, तो अब में राम-राम क्यूँ जपूँ ?


 







Spinach as a Natural Ayurvedic Medicine...!

Thursday, July 24, 2014

My life is like an open book.





Jealousy Quote: Never hate people who are jealous of...

Wednesday, July 23, 2014

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः
परोपकाराय बहन्ती नद्यः
परोपकाराय दुहन्ति गावः
परोपकाराय मिदं शरीरम,

The Statesman: On behalf of non-voting citizens



The Statesman: On behalf of non-voting citizens





In the 1940s, Westminster was a small farming community in the southern ... Most people of Mexican ancestry lived in colonies -- segregated residential .... Together, they sent a letter to the board of education demanding that the ...
Tale of two schools. Click here to read more...! 

Teaching tolerance...!

In the 1940s, Westminster was a small farming community in the southern ... Most people of Mexican ancestry lived in colonies -- segregated residential .... Together, they sent a letter to the board of education demanding that the ...
Tale of two schools. Click here to read more...!
 

हिंसा में शोक करनेवाले को ही हिन्दू कहते हैं....!


ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेഽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।

हे अर्जुन...!, शरीर रूप यंत्र में आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियोंको , अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मोंके अनुसार भ्रमण कराता हुआ , सब प्राणियोंके ह्रदय में स्थित हैं।
हिंसायाम् दुयते यस्मात् तस्मात्।
सः हिन्दुरित्यदिधीयते।।
हिंसा में शोक करनेवाले को ही हिन्दू कहते हैं , क्योंकी " ईशावास्याम् इदं सर्वम् " इस प्रमाण के अनुसार प्रपंच के समस्त जीव-जन्तुओंके शरीर में परमेश्वर निवसित हैं ।

"परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः
परोपकाराय बहन्ती नद्यः
परोपकाराय दुहन्ति गावः
परोपकाराय मिदं शरीरम,"

वहन्ति नद्यः स्वयमेव वृष्टिः ।
खादन्ति न स्वादु फलानि वृक्षाः ।।
पयोधरेण प्ररुहन्ति सस्याഃ।
परोपकाराय भवन्ति संतः। ।
नीति शतकम् - भर्तृहरि
നദികൾ താനേ ഒഴുകുന്നു , മഴപെയ്യുന്നതും , വൃക്ഷങ്ങൾ തളിർത്തു പൂത്തു കായ്ക്കുന്നതും , പശു പാൽ ചുരത്തുന്നതും, ഇവ ഒന്നും താന്താങ്കൾക്ക് വേണ്ടിയല്ല എന്നത് പോലെ, നമ്മുടെയീ ശരീരവും , പരോപകരത്തിനായെന്നറിയുക...! 

Monday, July 21, 2014

Sanatan Hinduism is a scientific religion....!.




Hinduism - 108 - one hundred and eight - what is the specialities in this number ?

दोहरा सद्गुरु श्रीचंद्र महाराज


ज़रा सोचिये......!

मनुष्य की आयु तथा उसकी सार्थकता एवं         निरर्थकता ...!.

                                शातायुरवै पुरुषः : सर्व युगेषु )
                           मनुष्य की सभी युगों  में आयु - १०० वर्ष
                   कलियुग में मानव की आयु -  ६५ वर्ष (कलौ पापचरणात त्रुटिः )

  1. बाल्यावस्था - ५ वर्ष पर्यंत.
  2. निद्रा           - प्रतिदिन २० घड़ी (८.घण्टे) के हिसाब से मनुष्य के आयु में से २० वर्ष निकल जाते हैं |
  3. विद्या         - ५ से २५ वर्ष के आयु के बीच प्रतिदिन २५ घड़ी (१० घण्टे ) के हिसाब से ८ वर्ष ४ मास  बीत जाते हैं. |
  4. व्यापार - नौकरी - २५- से ६० वर्ष के मध्य प्रतिदिन २० घड़ी (८.घण्टे ) गणित से ११ वर्ष ८  मास व्यतीत हो जाते हैं .|
  5. शौच क्रिया     - प्रतिदिन सवा घड़ी (१/२ . घण्टे ) के हिसाब से ६५ आयु वर्षों में से १ वर्ष ३ महीना चले जाते हैं ..!|
  6. दंतधावन- जल्पानादी - ५ से ६५ वर्ष तक प्रतिदिन २५ पल (१० मिनट) के हिस्साब से आयु के ५  मास बीत जाते हैं...!.|
  7. स्नान   - प्रति दिन सवा घड़ी (१/२. घंटा  ) के हिस्साब से समस्त आयु के २ वर्ष ६ मास  समाप्त हो जाते हैं...!. |
  8. भोजन - प्रतिदिन २ १/२ घड़ी (१ घंटा) के हिसाब से समस्त आयु के २ वर्ष ६  मास समाप्त हो जाते हैं...!.|.
  9. रहन-सहन   - वार्तालाप , नाटक, खेल-कूद , गप्प आदि में प्रतिदिन ६ घड़ी  (२.१/२ घण्टे) के हिस्साब से ६ वर्ष ३  मास बीत जाते हैं....!. |.
  10. रोग - प्रतिदिन २.१/२ घड़ी  (१ घंटा) के गणित से आयु के २ वर्ष चले जाते हैं ...!.|.
  11. गृह-व्यवस्था - प्रतिदिन ५ घड़ी  (२ घण्टे) के हिस्साब से ३ वर्ष एवं ४ महीने चले जाते हैं.|. इस प्रकार समस्त आयुष्य, संसारिक  झंझटों में बीत जाता हैं |. भगवान का भजन केवल १० वर्ष से ६५ वर्ष तक प्रति दिन आधा घंटा करो , तो अपनी आयु के १ वर्ष और १५ दिन परमेश्वर-परायणता में लग सकते हैं..!.| इतना भी यदि न हो , तो समस्त आयु पाप में बीत जायेगी.........!.
*:(fight) fight

Friday, July 18, 2014

Social outcasts.

“Outcasts, callused from being in exile for too long, learn to thrive on being the hated; the attention and infamy of our actions fuel us to become antiheroes. Too often do we forget: we risk self-destruction if we fail to follow what we know is right; our talents too often become misplaced, misdirected, misguided from what could have been something wonderful.”
  Mike Norton, Fighting For Redemption
 

The workaholics...

The workaholic ( too busy people) have turned the whole world into a madhouse. Everyone is mad with running and reaching somewhere and no man knows where this " somewhere " is...!
 The workaholics have done immense harm to the world. And the greatest harm they have deprived life of it's moments of it's celebration and festivity. It's because of them, that there so little festivity in the world, and every day it becomes increasingly dull, dreary and miserable .......... obsession with work has taken away the moments of celebration from our life, and we have been deprived of the excitement and thrill that comes with celebration....!
" In celebration you are a participant" in entertainment you are oily a spectator"
Osho- Click here to learn more
 

Saturday, July 12, 2014

Always be yourself...!





Friday, July 11, 2014

नीति शतकम् , നീതി ശതകം ..!

വനേ രണേ  ജലാഗ്നിമദ്ധ്യേ
മഹാർണവേ പർവതമസ്തകേ വാ
സുപ്തം പ്രമത്തം വിഷമസ്ഥിതിം വാ
രക്ഷതേ  പുണ്യാനി പുരാകൃതാനി .

വനങ്ങളിൽ ശത്രു ജലാഗ്നി യുദ്ധ-
 സ്ഥലങ്ങളിൽ, മേരുവിലാഴിതന്നിൽ
പെട്ടിട്ടഴൽപ്പെട്ടുഴലും,പ്രമത്തർ
ക്കെത്തുന്നു , രക്ഷക്കു പുരാണപുണ്യം.

"अर्थः गृहे निवर्तन्ते श्मशाने पुत्रबान्धवाः
सुकृतं दुष्कृतं चैव गच्छन्तमनुगच्छति। ।"
धन पेटी में ,पशु  आदि तबोलों में रहते हैं।  पत्नी घरके द्वार तक साध देती हैं।  मित्र , सम्बन्धी आदि श्मशान तक साथ देते हैं।  शरीर चिता में राख हो जाता  हैं । धर्म ही   केवल जवात्मा के साथ देते हैं।  


  

कालभैरव अष्टकम्

Embed Music Files - Listen Audio - kala-bhairava-ashtakam-01
देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं
व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम्
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबरं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥१॥
भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं
नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम्
कालकालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥२॥
शूलटङ्कपाशदण्डपाणिमादिकारणं
श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम्
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥३॥
   भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं
भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम्
विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं
 धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशकं
कर्मपाशमोचकं सुशर्मदायकं विभुम्
स्वर्णवर्णशेषपाशशोभिताङ्गमण्डलं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥५॥
 रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं
नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरंजनम्
मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥६॥
 अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं
दृष्टिपातनष्टपापजालमुग्रशासनम्
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥७॥
 भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं
काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम्
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं
 कालभैरवाष्टकं पठंति ये मनोहरं
ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम्
शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनं
प्रयान्ति कालभैरवांघ्रिसन्निधिं नरा ध्रुवम् ॥९॥

http://hindubhakti.blogspot.in/2011/08/kala-bhairava-ashtakam.html 

Thursday, July 10, 2014

"Never worry about what I'm doing. Only worry about why you're worried about what I'm doing. Never worry about what I'm doing. Only worry about why you're worried about what I'm doing...!"


Hindu spiritual leader Morari Bapu at an event in Rome..!

Tuesday, July 8, 2014

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः




 श्री गुरुस्तोत्रम्: गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः
 गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः
गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥१॥
 अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥२॥
 अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशालाकया
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३॥
 स्थावरं जङ्गमं व्याप्तं येन कृत्स्नं चराचरम्
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥४॥
 चिद्रूपेण परिव्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम्
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥५॥
 सर्वश्रुतिशिरोरत्नसमुद्भासितमूर्तये
वेदान्ताम्बूजसूर्याय तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥६॥
 चैतन्यः शाश्वतः शान्तो व्योमातीतोनिरञ्जनः
बिन्दूनादकलातीतस्तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥७॥
 ज्ञानशक्तिसमारूढस्तत्त्वमालाविभूषितः
भुक्तिमुक्तिप्रदाता तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥८॥
 अनेकजन्मसम्प्राप्तकर्मेन्धनविदाहिने
आत्मञ्जानाग्निदानेन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥९॥
शोषणं भवसिन्धोश्च प्रापणं सारसम्पदः
यस्य पादोदकं सम्यक् तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥१०॥

  गुरोरधिकं तत्त्वं गुरोरधिकं तपः
तत्त्वज्ञानात् परं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥११॥
 गुरुरादिरनादिश्च गुरुः परमदैवतम्
गुरोः परतरं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥१३॥
 ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्

एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षीभूतम्
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुंतं नमामि ॥१४॥


 श्री गुरु गोविन्द सिंहजी - दशम ग्रन्ध  
कोऊ भयो मुंडिया संयासी कोऊ जोगी भयो ,
कोऊ  ब्रह्मचारी कोऊ जाति अनुमानिबो
हिन्दू  तुरक कोऊ राफजी इमामसाफी ,
मानव की जात  सबि एकै पहचानबो।
करता करीब सोई राज़क रहीम ओई
दूसरो न भेद कोई मूल श्रम मानबो।
देहुरा मसीत सोई पूजा-ओ -नमाज़ ओई ,
मानस सबै एक पे अनेक श्रमाऊ हैं।
अल्लाह अभेख सोई पुरान और कुरान सोई ,
एक ही सरूप सबै एक ही बनाऊ हैं।
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्।। (
श्रीमद् भगवत गीता -7/20)
"जो-जो सकाम भक्त , जिस-जिस देवताके स्वरुप को श्रद्धासे पूजना चाहता हैं , उस-उस भक्तकी श्रद्धाको मैं उसी देवताके  प्रति स्थिर करता हूँ।" 
येഽप्यन्न्यदेवता भक्ता  यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेഽपि  मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्।।(
श्रीमद् भगवत गीता-9/23)
यदि श्रद्धासे युक्त जो सकाम भक्त दुसरे देवताओंको पूजते हैं , वे भी मुझे ही पूजते हैं ; किन्तु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात अज्ञानपूर्वक हैं।
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्वस्था मद्धये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्य गुणवृत्तिस्तथा अधो गच्छन्ति तामसाः।। (श्रीमद् भगवत गीता  14/18)

सत्वगुणमें स्थित  मनुष्य स्वर्गादि उच्च लोकोंको जाते हैं ; रजोगुणमें स्थित  राजस पुरुष मनुष्य लोकमें ही रह जाते हैं और तमोगुणमें स्थित  मनुष्य कीट, पशु आदि नीच योनि को प्राप्त होते हैं। 
यजन्ते सात्त्विका देवान्यरक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तमसा जाना। ।
(श्रीमद् भगवत गीता  -17/14)
सात्विक मनुष्य देवोंको पूजते हैं , राजस पुरुष यक्ष और राक्षसोंको तथा तामस मनुष्य प्रेत और भूतगणोंको पूजते हैं। 
 श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मोत्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः। (
श्रीमद् भगवत गीता-3/35)
अच्छी प्रकार आचरण में लाये हुए दूसरोंके धर्म  से गुणरहित भी अपना धर्म अत्युत्तम हैं।  अपने धर्म में तो मरना कल्याणकारक हैं और दूसरोंका धर्म भयको देनेवाले हैं।
 श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मोत्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्। ।(
श्रीमद् भगवत गीता-18/46)
अच्छी तरह आचरण किये हुए दूसरोंके धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ हैं ; क्योंकि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।

Monday, July 7, 2014


Thursday, July 3, 2014

Wednesday, July 2, 2014

जप के विधि - जप करना कैसे...?ജപിക്കേണ്ടത് എങ്ങനെ ....?


' यज्ञानां जपयज्ञोस्मि ' ( यज्ञोमे जपयज्ञ मैं ही हूँ - भगवान श्री कृष्ण - श्रीमद भगवत गीता ).
 जप तीन प्रकार के हैं।  साधारण ( वाचिकम , उपांशु और  मानसं ) . 
"विधियज्ञा पयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणै। 
 उपांशु: स्याच्छतगुणः साहस्रो मानसस्मृतः" ( मनु स्मृति )
दर्श - पौर्णमासादि विधि यज्ञोंसे साधारण जपयज्ञ दश गुण श्रेष्ठ हैं, उपांशु जप सौ गुण श्रेष्ठ हैं और मानस जप हज़ार गुण श्रेष्ठ हैं।  जो फल साधारण जपके हज़ार मंत्रोंसे होता हैं वहीँ फल उपांशु जपके सौ मंत्रोंसे और मानस जपके एक मन्त्र से हो जाता हैं।  उच्च स्वर से होनेवाले जपको साधारण ( वाचिक जप) कहते हैं । जिसमे जीभ और होंठ हिलते हैं परन्तु शब्द अन्दर ही  रहता हैं , वह उपांशुं जप हैं और जिसमें न जीभ के हिलाने की अवश्यकता  हैं होती हैं और होंठ के , वह मानस जप कहलाता हैं।
   अतएव जहाँ मंत्रकी भावना हैं।  नाम की दृष्टी में यह बात नहीं हैं, वहाँ तो  चाहे जैसे भी जपे - सभी प्रकार मंगल मय  हैं।  कोई विधि- निषेध हैं ही नहीं।  यह नाम का अलौकिक महिमा हैं।  भगवन्नाम में शुद्धि- अशुद्धि की भी कोई बात नहीं हैं।
अपवित्रः पवित्रो व सर्वावस्थां गतोഽअपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्यभ्यन्तरः शुचिः।।
अपवित्र हो , पवित्र हो , किसी भी अवस्था में क्यों न हो , भगवान पुण्डरीकाक्ष का स्मरण करते ही बाहर और भीतर की शुद्धि हो जाती हैं।  जल मृतिकासे केवल बाहर की ही शुद्धि होती हैं परन्तु भगवन्नाम अन्तर के मालोंको भी अशेष रूपसे धो डालता हैं , इसका किसी केलिए किसी अवस्था में कोई निषेध नहीं हैं।
 
पुरुष, नपुंसक, नारी व जीव चराचर कोई।
सर्वभाव भज कपट तजि मोही परम प्रिय सोयी।।
     
മഹർഷിമാരിൽ ഭൃഗു  ഞാനാണ് . വാക്കുകളി ' ഓം ' എന്ന ഏകാക്ഷര പദം  ഞാനാകുന്നു . ചിത്തശുദ്ധിക്കായുള്ള യജ്ഞങ്ങളിൽ ' ജപയജ്ഞം ' ഞാനാകുന്നു . സ്ഥാവര ദൃശ്യങ്ങളിൽ ഞാൻ ഹിമാലയമാകുന്നു .
ജപം മനസിനെ എകാഗ്രമാക്കുന്നു. മൂന്നു വിധത്തിൽ ജപിക്കാം (1). വാചികം (2). ഉപാംശു (3). മാനസം.ഉച്ചസ്വരത്തിൽ , ഉറക്കെ ജപിക്കുന്ന രീതിയാണ് ' വാചികം ' സ്വരങ്ങളോടു കൂടി അക്ഷരങ്ങളും പദങ്ങളും സ്പഷ്ടമായി ഉച്ചരിച്ച്,പതിഞ്ഞ ശബ്ദത്തിൽ  ജപിക്കുന്നതാണ് ' ഉപാംശു ', വാക്കും അർത്ഥ വും ധ്യാനിച്ച്‌ മനസുകൊണ്ട് ജപിക്കുന്നതാണ് ' മാനസം ' ഇവ മൂന്നും ഉത്തരോത്തരം ഫലസിദ്ധി ഉള്ളതാണ്...!.



Tuesday, July 1, 2014

Quote of the day....!

"Persons attempting to find a motive in this narrative will be prosecuted; persons attempting to find a moral in it will be banished; persons attempting to find a plot in it will be shot.....!"
  - Mark Twain