Tuesday, February 17, 2015

शिवरात्रि के इस पावन पर्व पर सफलता का डमरू सदेव आपके ऊपर बजता रहे। । मनोज कुरुप , पत्तनमथिट्टा , केरला


 स वै रुद्रः स च शिवः सोഽग्निः सर्वः स सर्वजित्।
स चैवेन्द्रश्च वायुश्च सोഽश्विनौ स च विद्युतः।।
स चन्द्रमाः स चेशानः स सूर्यो वरुणश्च सः।
स कालः सोഽ न्तको मृत्युः स यमो रात्र्यहानि च। ।
मासार्धमासा ऋतवः संध्ये संवत्सरश्च सः।
स धाता स विधाता च विश्वकर्मा स सर्ववित्। ।
नक्षत्राणि गृहाश्चैव दिशेഽथ प्रादिशास्तथा।
विश्वमूर्तिरमेयात्मा भगवान परमद्युतिः।।
एकधा च द्विधा चैव बहुधा च स एव हि।
शतधा सहस्रधा चैव तथा शतसहस्रधा। ।
ईदृशः स महादेवो भूयश्च भगवानतः।
न हि शाक्य गुना वक्तुमपि वर्षशतैरपि। ।

श्रीमद् महाभारतम् -अनुशासन पर्वं -दान १६० /३१-४ ४
वे ही इंद्र हैं, वे  ही शिव हैं ,   वे ही अग्नि हैं , वे ही सर्वस्वरूप और सर्वविजयी हैं। वे ही इंद्र और  वायू हैं , वे  ही अश्विनी कुमार और विद्युत हैं।  वे ही चन्द्रमा ,वे ही ईशान , वे ही सूर्य , वे ही वरुण , वे ही काल , वे ही आंतक वे ही मृत्यु , वे ही याम तथा वे ही रात और दिन हैं।  मॉस पक्ष ऋतू ,संध्या संवत्सर भी वही हैं।  नक्षत्र गृह ,दिशा ,विदिशः भी वे ही हैं।  वे ही विश्वरूप हैं. वे ही धाता ,विधाता ,विश्वकर्मा और सर्वज्ञ हैं। अप्रमेयात्मा ,षड्विध् ,ऎश्वर्य से युक्त एवं परम तेजस्वी हैं. उनके एक ,,दो  अनेक , सौ , हज़ार , और लाखों रूप हैं।  भगवान शिव ऎसे प्रभावशाली हैं , बल्कि इससे भी बढ़कर हैं।  सैकड़ोंवर्षों में भी उनके गुणों का वर्णन नहीं किया जा सकता।