Monday, April 20, 2015

भक्तों के महत्व

 मद्भक्ता ये नरश्रेष्ठ मद्भक्ता मत्परायणा :  ।
मद्याजिनो मन्नियमास्तान प्रयत्नेन पूजयेत्। ।
तेषां तू पावनायाहं नित्यमेव युधिष्ठिरः ।
उभे संध्ये/धिष्ठामि ह्यस्कन्नं तद व्रतं मम। ।
तस्मादष्टाक्षरं मन्त्रम मद्भक्तैर्वीतकलमषै : ।
संध्याकाले तु जप्तव्यं सततं चाद्मशुद्धये। ।
अन्येषामपि विप्राणां किल्बिषं हि विनश्यति।
उभे संध्ये/प्युपासीत तस्माद विप्रो विशुद्धये। ।

नरश्रेष्ठ ...!  जो मेरे भक्त हो , मेरे में मन लगानेवाले हो , मेरी  शरण में हो , मेरा पूजन करते हो , और नियमपूर्वक मुझ में  ही लगे रहते हो , उनका यत्नपूर्वक  पूजन करना चाहिए।  युधिष्ठिर  अपने उन भक्तोंको पवित्र  केलिए , मैं प्रतिदिन दोनों समय संध्या में व्याप्त रहता हूँ।  मेरा यह नियम कभी खंडित नहीं होता।  इसलिए मेरे भक्तोंको चाहिए कि , वे आत्मशुद्धि के लिए संध्या के समय निरंतर अष्टाक्षर मन्त्र ( ॐ  नमो नारायणाय ) का जप करते रहे।  संध्या और अष्टाक्षर मन्त्र का जाप करने से दुसरे मनुष्योंके भी पाप नष्ट हो जाते हैं।  इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को दोनों काल की संध्या  अवश्य करनी चाहिए।