Thursday, April 30, 2015
Saturday, April 25, 2015
'धर्मात्माओंको सदा परमात्मा का एहसास'
किसी शहर में एक धर्मात्मा रहता था I वह सदा भागवतभक्ति में मगन रहता था I एक रात उस आदमी ने एक अजीब सा सपना देखा I उसने देखा , कि वह सागर किनारे अपने भगवान के साथ चला जा राहा है , और आकाश में , उसके जीवन के तमाम घटनाओं के दृश्य , एक- एक करके दृष्टीगोचर हो रहे हैं I प्रत्येक दॄष्योंके साथ -साथ, समुद्र के रेती पर , उसके पगचिह्नों के साथ , एक और जोड़ी पादचिह्न पड़ते जा रहे थे।
इसका मतलब था , उसके आराध्य प्रभु भी उसके साथ चल रहे थे, और दूसरे पगचिह्न उन्ही के थे। धीरे -धीरे उसके जीवन का अंतिम पड़ाव आ गया। वह दृश्य सारे उसकी आँखोंके सामने से गुजरने पर ,उसने पलटकर रेती के पगचिह्नोंको देखा , तो देखकर हैरान रह गया , कि उसके जीवन-पथ में अनेक जगहों पर , दो की जगह एक ही जोड़ी पादचिह्न नज़र आ रहे थे। उसे यह भी पता चला कि , वे पगचिह्न , उन घड़ियोंके थे , जब वह किसी संकट एवं दुखी अवस्था में था। वे इस दिव्यानुभूति से विस्मित हो उठा , और आपने , अपने आराध्य देवता से पुछा , ' प्रभु , मैं तो समझ रहा था कि , आपकी कृपा हर क्षण मेरे ऊपर बनी रही हैं , और मेरे जीवन के हर पल , आप मेरे -साथ साथ चले हैं। किंतु यह दृश्य मुझे विचलित कर रहा हैं। मैं देख रहा हूँ कि , जब कभी भी मुझे कोई संकट या विपत्ति घड़ी आई और जहां आपके सहारे का सबसे ज़्यादा ज़रुरत था , तब आपने मेरा साथ कैसा छोड़ दिया? क्या मेरी भक्ति में कोई कमियाँ रह गयी प्रभु ?
यह सुनकर प्रभु ने कहा - वत्स तुम्हारा सोचना ग़लत हैं। मैं अपने भक्तोंका साथ कभी नहीं छोड़ता। दरअसल तुमने अपने दुःख या संकट के अवसरों पर , जो मात्र एक जोड़ी पगचिह्नों को देखा , वे तुम्हारे नहीं , मेरे पगचिह्न हैं , जब मैं तुम्हें अपने कंधों पर उठाये , चल रहा था। यह सुनकर , उस धर्मात्मा को अपनी भूल का एहसास हो गया।
इसका मतलब था , उसके आराध्य प्रभु भी उसके साथ चल रहे थे, और दूसरे पगचिह्न उन्ही के थे। धीरे -धीरे उसके जीवन का अंतिम पड़ाव आ गया। वह दृश्य सारे उसकी आँखोंके सामने से गुजरने पर ,उसने पलटकर रेती के पगचिह्नोंको देखा , तो देखकर हैरान रह गया , कि उसके जीवन-पथ में अनेक जगहों पर , दो की जगह एक ही जोड़ी पादचिह्न नज़र आ रहे थे। उसे यह भी पता चला कि , वे पगचिह्न , उन घड़ियोंके थे , जब वह किसी संकट एवं दुखी अवस्था में था। वे इस दिव्यानुभूति से विस्मित हो उठा , और आपने , अपने आराध्य देवता से पुछा , ' प्रभु , मैं तो समझ रहा था कि , आपकी कृपा हर क्षण मेरे ऊपर बनी रही हैं , और मेरे जीवन के हर पल , आप मेरे -साथ साथ चले हैं। किंतु यह दृश्य मुझे विचलित कर रहा हैं। मैं देख रहा हूँ कि , जब कभी भी मुझे कोई संकट या विपत्ति घड़ी आई और जहां आपके सहारे का सबसे ज़्यादा ज़रुरत था , तब आपने मेरा साथ कैसा छोड़ दिया? क्या मेरी भक्ति में कोई कमियाँ रह गयी प्रभु ?
यह सुनकर प्रभु ने कहा - वत्स तुम्हारा सोचना ग़लत हैं। मैं अपने भक्तोंका साथ कभी नहीं छोड़ता। दरअसल तुमने अपने दुःख या संकट के अवसरों पर , जो मात्र एक जोड़ी पगचिह्नों को देखा , वे तुम्हारे नहीं , मेरे पगचिह्न हैं , जब मैं तुम्हें अपने कंधों पर उठाये , चल रहा था। यह सुनकर , उस धर्मात्मा को अपनी भूल का एहसास हो गया।
Friday, April 24, 2015
Really nice rare picts
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With regards
Abhijit Halder
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Thursday, April 23, 2015
Tuesday, April 21, 2015
क्या मैं भारतीय नहीं हूँ ?
आज एक धर्मनिरपेक्षतावादि से भेंट हुई।
घूरने लगा मुझे अकारण कुछ डरावना अंदाज़ से
तो मैंने पूच्छा क्यों भाई घूर क्यों रहे हो ?
तो वह कहने लगा , क्या मैं भारतीय नहीं हूँ ?
अरे भाई मैंने कब कहा तुम भारतीय नहीं हो?
फिर महाशय ने पुछा क्या तुमने चड्डी पहन रखा हैं ?
होश उड़ गया मेरा सुनते ही बात बेहुदा के।
मैंने हाथ जोड़कर रहम की भीख मांगने लगा।
भाई चैन से बैठने दो मुझे ।
छोड़ दो मुझे अपने हाल पे। ।
अब पहने चड्डी की ब्रांड रूपा या डॉलर ।
अरविन्द या मधुरा कोट के। ।
सुनने से पहले निकल आया मैं जान बचा के।
तब मैंने उसे यह बात कहने को सोचा पर कहा नहीं।
आखिर जगह गॉड'स ऑवन कंट्री जो ठहरा।
जीवन नारकीय बनने को फिर देर नहीं लगेगा ।
घूरने लगा मुझे अकारण कुछ डरावना अंदाज़ से
तो मैंने पूच्छा क्यों भाई घूर क्यों रहे हो ?
तो वह कहने लगा , क्या मैं भारतीय नहीं हूँ ?
अरे भाई मैंने कब कहा तुम भारतीय नहीं हो?
फिर महाशय ने पुछा क्या तुमने चड्डी पहन रखा हैं ?
होश उड़ गया मेरा सुनते ही बात बेहुदा के।
मैंने हाथ जोड़कर रहम की भीख मांगने लगा।
भाई चैन से बैठने दो मुझे ।
छोड़ दो मुझे अपने हाल पे। ।
अब पहने चड्डी की ब्रांड रूपा या डॉलर ।
अरविन्द या मधुरा कोट के। ।
सुनने से पहले निकल आया मैं जान बचा के।
तब मैंने उसे यह बात कहने को सोचा पर कहा नहीं।
आखिर जगह गॉड'स ऑवन कंट्री जो ठहरा।
जीवन नारकीय बनने को फिर देर नहीं लगेगा ।
तो अब मैंने वो बात आप को सुना रहा हूँ।
तो सुनिए :-
रे परम कुटिल कुमारग गामी।
मनुरूपधारी कपट अंतरजामी। ।
देखि तेरी प्रभुताई ।
तिलु तेरी वडियाई। ।
मूढ़ जानी सठ छोड़ेॐ तोही।
लागेसी अधम पचारै मोही। ।
मृत्यु निकट आई तोही।
लागे अधम सिखावन मोही। ।
जानु ढोल गँवार सूद्र पसु नारी।
सकल ताड़ना के अधिकारी। ।
अधम निलज्ज छुछूंन्तर।
अंगभंग करि पठाइबो बन्दर। ।
Monday, April 20, 2015
भक्तों के महत्व
मद्भक्ता ये नरश्रेष्ठ मद्भक्ता मत्परायणा : ।
मद्याजिनो मन्नियमास्तान प्रयत्नेन पूजयेत्। ।
तेषां तू पावनायाहं नित्यमेव युधिष्ठिरः ।
उभे संध्ये/धिष्ठामि ह्यस्कन्नं तद व्रतं मम। ।
तस्मादष्टाक्षरं मन्त्रम मद्भक्तैर्वीतकलमषै : ।
संध्याकाले तु जप्तव्यं सततं चाद्मशुद्धये। ।
अन्येषामपि विप्राणां किल्बिषं हि विनश्यति।
उभे संध्ये/प्युपासीत तस्माद विप्रो विशुद्धये। ।
नरश्रेष्ठ ...! जो मेरे भक्त हो , मेरे में मन लगानेवाले हो , मेरी शरण में हो , मेरा पूजन करते हो , और नियमपूर्वक मुझ में ही लगे रहते हो , उनका यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिए। युधिष्ठिर अपने उन भक्तोंको पवित्र केलिए , मैं प्रतिदिन दोनों समय संध्या में व्याप्त रहता हूँ। मेरा यह नियम कभी खंडित नहीं होता। इसलिए मेरे भक्तोंको चाहिए कि , वे आत्मशुद्धि के लिए संध्या के समय निरंतर अष्टाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो नारायणाय ) का जप करते रहे। संध्या और अष्टाक्षर मन्त्र का जाप करने से दुसरे मनुष्योंके भी पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को दोनों काल की संध्या अवश्य करनी चाहिए।
मद्याजिनो मन्नियमास्तान प्रयत्नेन पूजयेत्। ।
तेषां तू पावनायाहं नित्यमेव युधिष्ठिरः ।
उभे संध्ये/धिष्ठामि ह्यस्कन्नं तद व्रतं मम। ।
तस्मादष्टाक्षरं मन्त्रम मद्भक्तैर्वीतकलमषै : ।
संध्याकाले तु जप्तव्यं सततं चाद्मशुद्धये। ।
अन्येषामपि विप्राणां किल्बिषं हि विनश्यति।
उभे संध्ये/प्युपासीत तस्माद विप्रो विशुद्धये। ।
नरश्रेष्ठ ...! जो मेरे भक्त हो , मेरे में मन लगानेवाले हो , मेरी शरण में हो , मेरा पूजन करते हो , और नियमपूर्वक मुझ में ही लगे रहते हो , उनका यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिए। युधिष्ठिर अपने उन भक्तोंको पवित्र केलिए , मैं प्रतिदिन दोनों समय संध्या में व्याप्त रहता हूँ। मेरा यह नियम कभी खंडित नहीं होता। इसलिए मेरे भक्तोंको चाहिए कि , वे आत्मशुद्धि के लिए संध्या के समय निरंतर अष्टाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो नारायणाय ) का जप करते रहे। संध्या और अष्टाक्षर मन्त्र का जाप करने से दुसरे मनुष्योंके भी पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को दोनों काल की संध्या अवश्य करनी चाहिए।
Friday, April 17, 2015
Monday, April 13, 2015
Friday, April 10, 2015
पशु ,पक्षी और मृग आदि सभी प्राणि समझदार होते हैं।
केचिद्विवा तथा रात्रौ प्रनिन्स्तुल्यद्रुष्टयः। .
ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम्। । .
यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः। .
ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणां। ।
मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः। ।
कुछ प्राणि दिन में नहीं देखते दुसरे रात में नहीं देखते तथा कुछ ऍसे प्राणि हैं जो दिन और रात में बराबर देखते हैं। यह तो ठीक हैं मनुष्य समझदार होते हैं ; किंतु केवल वे ही नहीं होते। पशु ,पक्षी और मृग आदि सभी प्राणि समझदार होते हैं। मनुष्योंके समझ भी वैसी ही होती हैं , जैसी उन मृग और पक्षी आदि की होते हैं. तथा जैसी मनुष्यों की होती हैं ,वैसी मृग-पक्षी आदि की होती हैं।
देवी भागवत अध्यायम -१ (४८ ,४९ ,५० )
കേചിദ്ദിവാ തഥാ രാത്റൗ പ്റാണിന സ്തുലൃദൃഷ്ടയ:
ജ്ഞാനിനോ മനുജാ: സത്യം കിം തു തേന ഹി കേവലം
യതോ ഹി ഞാനിന: സർവേ പശുപക്ഷിമൃഗാദയ:
ജ്ഞാനം ച തന്മനുഷ്യാണാം യത്തേഷാം മൃഗപക്ഷിണാം
മനുഷ്യാണാം ച യത്തേഷാം തുല്യമന്യത്തഥോഽഭയോ:
ചില പ്റാണികൽക്ക് പകൽ കാഴ്ചയില്ല ,മറ്റു ചിലതിന് രാത്റിക്കാഴച്ചയും ഇല്ല പിന്നെ മറ്റു ചിലതിന് രാ -പകൽ കാഴ്ച്ച ഒരുപോലെയുമാണ് . മനുഷ്യൻ ജ്ഞാനിയാണ് എന്നതിന് തർക്കമൊന്നുമില്ല , പക്ഷെ ഇക്കാര്യത്തിൽ പശുപക്ഷിമൃഗാദികളും മനുഷ്യനെപ്പോലെ തന്നെ ജ്ഞാനികളാണ് . മനുഷ്യന്റെ അറിവിന് തുല്യം തന്നെ അറിവും , ജ്ഞാനവും പശുപക്ഷിമൃഗങ്ങൽക്കുമുണ്ട് . മറ്റൊരർത്ഥത്തിൽ പറഞ്ഞാൽ , ഇക്കാര്യത്തിൽ മനുഷ്യനും , പശുപക്ഷിമൃഗാദികളും തുല്യരാണ് .
ദേവീ ഭാഗവതം അദ്ധ്യായം ഒന്ന് -48 ,49 .
ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम्। । .
यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः। .
ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणां। ।
मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः। ।
कुछ प्राणि दिन में नहीं देखते दुसरे रात में नहीं देखते तथा कुछ ऍसे प्राणि हैं जो दिन और रात में बराबर देखते हैं। यह तो ठीक हैं मनुष्य समझदार होते हैं ; किंतु केवल वे ही नहीं होते। पशु ,पक्षी और मृग आदि सभी प्राणि समझदार होते हैं। मनुष्योंके समझ भी वैसी ही होती हैं , जैसी उन मृग और पक्षी आदि की होते हैं. तथा जैसी मनुष्यों की होती हैं ,वैसी मृग-पक्षी आदि की होती हैं।
देवी भागवत अध्यायम -१ (४८ ,४९ ,५० )
കേചിദ്ദിവാ തഥാ രാത്റൗ പ്റാണിന സ്തുലൃദൃഷ്ടയ:
ജ്ഞാനിനോ മനുജാ: സത്യം കിം തു തേന ഹി കേവലം
യതോ ഹി ഞാനിന: സർവേ പശുപക്ഷിമൃഗാദയ:
ജ്ഞാനം ച തന്മനുഷ്യാണാം യത്തേഷാം മൃഗപക്ഷിണാം
മനുഷ്യാണാം ച യത്തേഷാം തുല്യമന്യത്തഥോഽഭയോ:
ചില പ്റാണികൽക്ക് പകൽ കാഴ്ചയില്ല ,മറ്റു ചിലതിന് രാത്റിക്കാഴച്ചയും ഇല്ല പിന്നെ മറ്റു ചിലതിന് രാ -പകൽ കാഴ്ച്ച ഒരുപോലെയുമാണ് . മനുഷ്യൻ ജ്ഞാനിയാണ് എന്നതിന് തർക്കമൊന്നുമില്ല , പക്ഷെ ഇക്കാര്യത്തിൽ പശുപക്ഷിമൃഗാദികളും മനുഷ്യനെപ്പോലെ തന്നെ ജ്ഞാനികളാണ് . മനുഷ്യന്റെ അറിവിന് തുല്യം തന്നെ അറിവും , ജ്ഞാനവും പശുപക്ഷിമൃഗങ്ങൽക്കുമുണ്ട് . മറ്റൊരർത്ഥത്തിൽ പറഞ്ഞാൽ , ഇക്കാര്യത്തിൽ മനുഷ്യനും , പശുപക്ഷിമൃഗാദികളും തുല്യരാണ് .
ദേവീ ഭാഗവതം അദ്ധ്യായം ഒന്ന് -48 ,49 .
Thursday, April 9, 2015
पशुपत्याष्टकं Pashupati Ashtakam - The octet on lord of all beings
ध्यानम्
ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं
रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् ।
पद्मासीनं समन्तात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं
विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम॥१॥
स्तोत्रम्
पशुपतीन्दुपतिं धरणीपतिं भुजगलोकपतिं च सती पतिम् ।गणत भक्तजनार्ति हरं परं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥१॥
न जनको जननी न च सोदरो न तनयो न च भूरिबलं कुलम् ।
अवति कोऽपि न कालवशं गतं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ २॥
अवति कोऽपि न कालवशं गतं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ २॥
मुरजडिण्डिवाद्यविलक्षणं मधुरपञ्चमनादविशारदम् ।
प्रथमभूत गणैरपि सेवितं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥३॥
शरणदं सुखदं शरणान्वितं शिव शिवेति शिवेति नतं नृणाम् ।
अभयदं करुणा वरुणालयं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥४॥
नरशिरोरचितं मणिकुण्डलं भुजगहारमुदं वृषभध्वजम् ।
चितिरजोधवली कृत विग्रहं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥५॥
मुखविनाशङ्करं शशिशेखरं सततमघ्वरं भाजि फलप्रदम् ।
प्रलयदग्धसुरासुरमानवं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥६॥
मदम पास्य चिरं हृदि संस्थितं मरण जन्म जरा भय पीडितम् ।
जगदुदीक्ष्य समीपभयाकुलं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥७॥
पशुपतेरिदमष्टकमद्भुतं विरिचित पृथिवी पति सूरिणा ।
पठति संशृनुते मनुजः सदा शिवपुरिं वसते लभते मुदम् ॥९॥॥ പശുപത്യാഷ്ടകം ॥
ധ്യാനം ।
ധ്യായേന്നിത്യം മഹേശം രജതഗിരിനിഭം ചാരുചന്ദ്രാവതംസം
രത്നാകല്പോജ്ജ്വലാങ്ഗം പരശുമൃഗവരാഭീതിഹസ്തം പ്രസന്നം ।
പദ്മാസീനം സമന്താത്സ്തുതമമരഗണൈര്വ്യാഘ്രകൃത്തിം വസാനം
വിശ്വാദ്യം വിശ്വബീജം നിഖിലഭയഹരം പഞ്ചവക്ത്രം ത്രിനേത്രം ॥
സ്തോത്രം ।
പശുപതീന്ദുപതിം ധരണീപതിം ഭുജഗലോകപതിം ച സതീ പതിം ॥
ഗണത ഭക്തജനാര്തി ഹരം പരം ഭജത രേ മനുജാ ഗിരിജാപതിം ॥ 1॥
ന ജനകോ ജനനീ ന ച സോദരോ ന തനയോ ന ച ഭൂരിബലം കുലം ॥
അവതി കോഽപി ന കാലവശം ഗതം ഭജത രേ മനുജാ ഗിരിജാപതിം ॥ 2॥
മുരജഡിണ്ഡിവാദ്യവിലക്ഷണം മധുരപഞ്ചമനാദവിശാരദം ॥
പ്രഥമഭൂത ഗണൈരപി സേവിതം ഭജത രേ മനുജാ ഗിരിജാപതിം ॥ 3॥
ശരണദം സുഖദം ശരണാന്വിതം ശിവ ശിവേതി ശിവേതി നതം നൃണാം ॥
അഭയദം കരുണാ വരുണാലയം ഭജത രേ മനുജാ ഗിരിജാപതിം ॥ 4॥
നരശിരോരചിതം മണികുണ്ഡലം ഭുജഗഹാരമുദം വൃഷഭധ്വജം ॥
ചിതിരജോധവലീ കൃത വിഗ്രഹം ഭജത രേ മനുജാ ഗിരിജാപതിം ॥ 5॥
മുഖവിനാശങ്കരം ശശിശേഖരം സതതമഘ്വരം ഭാജി ഫലപ്രദം ॥
പ്രലയദഗ്ധസുരാസുരമാനവം ഭജത രേ മനുജാ ഗിരിജാപതിം ॥ 6॥
മദമ പാസ്യ ചിരം ഹൃദി സംസ്ഥിതം മരണ ജന്മ ജരാ ഭയ പീഡിതം ॥
ജഗദുദീക്ഷ്യ സമീപഭയാകുലം ഭജത രേ മനുജാ ഗിരിജാപതിം ॥ 7॥
ഹരിവിരിഞ്ചിസുരാധിമ്പ പൂജിതം യമജനേശധനേശനമസ്കൃതം ॥
ത്രിനയനം ഭുവന ത്രിതയാധിപം ഭജത രേ മനുജാ ഗിരിജാപതിം ॥ 8॥
പശുപതേരിദമഷ്ടകമദ്ഭുതം വിരിചിത പൃഥിവീ പതി സൂരിണാ ॥
പഠതി സംശൃനുതേ മനുജഃ സദാ ശിവപുരിം വസതേ ലഭതേ മുദം ॥ 9॥Tuesday, April 7, 2015
മനസ്സില് മടിയുടെ സ്മരണകൾ ഉണർത്തിക്കൊണ്ട് വീണ്ടുമൊരു ഹർത്താൽ കൂടി , എല്ലാവർക്കുൻ സ്നേഹമസൃണമായ ' ഹർത്താൽ ദിനാശംസകൾ ....!
Monday, April 6, 2015
പെരുമാനൊരു മാതൊരുപാകൻ.
കൊങ്കുനാട്ടിലൊരു പൊട്ടക്കെണ -
ണറ്റിങ്കലിരുന്നാ പ്പെരുമാനൊരു കഥ കോറി
അച്ചടിച്ച പൊത്തകത്തിന്റെ മൊത്തം
നൂറ്റുക്കെമ്പതും വിറ്റപോയപ്പം
പെ൯ഗ്വിനൊന്നടിത്തട്ടീന്ന്
പൊങ്ങിവന്നാ പൊത്തകമടിച്ചു മാറ്റീട്ടാ-
ധുനിക സഭ്യ ഭാഷാ വിവർത്തന മൊണ്ടാക്കീ -
ട്ടു പിന്നെ , മാക്റിക്കൂട്ടങ്ങളെ ക്കൊണ്ടാ-
പ്പെരുമാനെക്കല്ലെറീക്കുന്ന
വില്പ്പന തന്ത്റമോന്നു മെനഞ്ഞു
എലക്കും മുള്ളിനും കേടുവരാണ്ട്
മെനഞ്ഞോരടവിന്നൊടുവില്
പോട്ടക്കെണററിലെ മുറിമൂക്കൻ പെരുമാൻ -
ചേരമാൻ പെരുമാ , നേറുകൊണ്ട് ചുരുണ്ടപ്പം
ഒറ്റ ഒറേൽ രണ്ടുവാളോന്നു ചോദിച്ചും -
കൊണ്ടാ പെ൯ഗ്വിൻ പോട്ടക്കെണറ്റീന്ന്
പൊട്ടക്കൊളത്തിലോട്ടോറ്റച്ചാട്ടം
വിഢിപ്പെട്ടീൽ കഥയറിയാതാട്ടം
കണ്ട കഴുതക്കൂട്ടം ഞങ്ങൾ, നാണം കെട്ടോർ നാട്ടവർ.
മനോജ് കുറുപ്പ് പത്തനംതിട്ട
ആധുനിക വിപണന തന്ത്റങ്ങൾ

Jan 13, 2013 - The ship that was towing a naval barge from Kolkatta to a port near ... afloat around 100 metres away hit the Pamban Rail Bridge this morning, ...Read More
Release dates. 1 February 2013 ... Kadal (English: The Sea) is a 2013 Indian Tamil drama film directed

Saturday, April 4, 2015
उद्धवगीता - श्रीमद्भागवत-Stop Suffering Your Freedom ...!
In Hindu mythology, Shri Hanuman is regarded as the God of power, strength and knowledge. He is known as the ‘param bhakt’ of lord Rama and is the incarnation of Lord Shiva. He was born to Kesari and Anjani on the Chaitra Shukla Purnima (Chaitra Shukla Purnima is the Full Moon Day on the Hindu Calendar Month of Chaitra) that is why, he is known as ‘KESERI NANDAN’ and ‘ANJANEYA’. The philosophy of epic Ramayana is incomplete without the understanding of the unfathomable devotion of Lord Hanuman for Shri Rama. As Hindu Mythology says, He was the incarnation of Lord Shiva the God of Destruction, the Third god of Hindu trinity (All this universe is in the glory of God, of Shiva, the God of Love. The heads and faces of men are His own and He is in the hearts of all (- Yajur Veda).Hanuman Jayanti is celebrated on in the Indian month of Chaitra on the Purnima tithi every year. Chaitra Shukla Purnima (Chaitra Shukla Purnima is the Full Moon Day on the Hindu Calendar Month of Chaitra) .
भूतसूक्ष्मात्मनि मयि तन्मात्रम धारयेन्मनः।
अनिमानमवाप्नोति तन्मात्रोपासको ममः। ।
महत्यात्मानमार्य परे यथासंस्थां मनेदथत।
महिमानमवाप्नोति भूतानां च पृथक -पृथक। ।
उद्धवगीता - श्रीमद्भागवत -११ -१५ (१० -१७ )
प्रिय उद्धव...!। पञ्चभूतोंकी सूक्ष्मतम मात्राएँ मेरा ही शरीर हैं। जो साधक, केवल मेरे उस शरीर की , और अपने मनको , उसीमें - अर्थात मेरे तन्मात्रात्मक शरीर के अतिरिक्त और किसी वास्तु का चिंतन नहीं करता ,उसे 'अणिमा ' नाम की सिद्धि ,अर्थात पत्थर की चट्टान आदि में भी प्रवेश करने की शक्ति - 'अणुता ' प्राप्त हो जाती हैं। महत्तत्वके रूप में भी, मैं ही प्रकाशित हो रहा हूँ ,और उस रूप में समस्त व्यावहारिक ज्ञानोंका केंद्र हूँ। जो मेरे उस रूप में अपने मनको महत्तत्वाकार कर के, स्थिर कर देता हैं , उसे 'महिमा ' नाम की सिद्धि प्राप्त होती हैं, और इसी प्रकार आकाशादि पञ्चभूतोंमें - जो मेरे ही शरीर हैं - अलग अलग मन लगानेसे -उनकी महत्ता प्राप्त हो जाती हैं।

























