Sunday, January 31, 2016

The Holly cow..!

Saturday, January 23, 2016

നന്മയുടെ ഒരു ചിരിക്കുന്ന മുഖം .

തളർന്ന്  എലുമ്പിച്ച  കൈകാലുകളും , പിന്നെ അഴുകിയ  ഇടം കണ്ണുമായി , അയാൾ  നഗരത്തിലെ  ഫ്ലൈ ഓവറിനു കീഴെ കാതോർത്തു  കിടന്നു . ആരെങ്കിലും  വരും  .....!  എന്തെങ്കിലും  തരാതിരിക്കില്ല....! എന്ന  പ്രതീക്ഷയോടെ . സമീപത്തു കൂടെ ഒരുപാട് വാഹനങ്ങൾ   പോടിയുതിർത്ത്  പാഞ്ഞു മറഞ്ഞു . എന്നാൽ  മദ്ധ്യാഹ്ന൦  വരെ ആർക്കും  അവൻ ദൃഷ്ടിഗോചരമായില്ല . അമ്പതു ലക്ഷങ്ങളുടെ  നഗരത്തിൽ  , നന്മയുടെ  ഒരു മുഖം  കാണാൻ  കൊതിച്ച് അയാൾ  കിടന്നു  . പട്ടിണിയുടെ  ദൈന്യതയിൽ  പലവട്ടം  ബോധശൂന്യതയിലേക്ക്  വഴുതി വീണുകൊണ്ടിരുന്ന വേളകളിൽ  .  ചാവാലിപ്പട്ടികൾ   , പുതച്ചിരുന്ന മലമൂത്ര ലിപ്തമായ  പഴന്തുണിയിലേക്ക്  ഇടയ്ക്കിടയ്ക്ക്  മൂത്രമൊഴിച്ചു കൊടുത്തുകൊണ്ടിരുന്നതിന്റെ   ഈർപ്പത്തിൽ , അവൻ ബോധം വീണ്ടെടുത്തു കൊണ്ടുമിരുന്നു . സായാഹ്നം വരെ തുടർന്നു  കൊണ്ടിരുന്ന ഈ പ്രക്രിയയുടെ  അന്ത്യത്തിൽ  , അവൻ പ്രതീക്ഷിച്ച  നന്മയുടെ മുഖം  , ഗാന്ധിയുടെ  ചിരിക്കുന്ന മുഖമുള്ള   നൂറിന്റെ  ഒരു നോട്ടായി  എവിടെനിന്നോ കണ്മുന്നിൽ  പ്രത്യക്ഷപ്പെട്ടു . ആരോ  അയാളുടെ മൂത്രപ്പഴന്തുണി  മാറ്റി അത്  വച്ചു നീട്ടുകയായിരുന്നു ...!  . പൊടുന്നനെ   സൂര്യപ്രകാശം  കണ്ണിലടിച്ച അസഹ്യതയിൽ  വലം കണ്ണ്  പ്രയാസപ്പെട്ട്  തുറന്നു .  ആദ്യം അത് ഒരു സ്വപ്നമെന്നവൻ കരുതി  കണ്ണ് അലസതയോടെ തിരികെ പൂട്ടി പഴയപടി  തന്നെ കിടന്നു . ' വാങ്ങിക്കോളൂ ..!' എന്ന  ശബ്ദം ആവർത്തിച്ചു  കേട്ടപ്പോൾ,  അത്  സ്വപ്നമല്ല  യാഥാർത്ഥൃ൦  തന്നെയെന്നു മനസിലാക്കി . പിന്നെ  തന്റെ തളർന്ന  കൈകൾ   പ്രയാസപ്പെട്ട്  ഉയരത്തി  അത്  വാങ്ങി  . പത്തുരൂപാ നോട്ടു പോലും  കണ്ട്  മറന്ന  അവന്റെ  കണ്ണുകളിൽ നിന്നും അപ്പോൾ  പഴുപ്പും കണ്ണീരും  യോജിച്ച്  ചുടു നീരായോഴുകി . എന്നാൽ അത്   തൽക്ഷണം  തന്നെ  കൊടും ചൂടിന്റെ കാഠിന്യത്തിൽ   വറ്റി വരളുകയും ചെയ്തു  . അവന്റെ  കൈപ്പത്തിയിൽ  ചുരുണ്ട  ആ  ഗാന്ധിയുടെ ചിരിക്കുന്ന  മുഖത്തേക്ക്,  തത്സമയം  ചുറ്റുപാടുമിരുന്നു കലപില കൂടിക്കൊണ്ടിരുന്ന ,  മറ്റു തെണ്ടിപ്പരിഷകൾ  ആർത്തിയും  അസൂയയും  മുഴുത്ത  കണ്ണുകളുമായി നോക്കി കൊണ്ടിരുന്നു .
 പിറ്റേന്ന്  തുറിച്ച  കണ്ണുകളും , പുറത്തേക്ക്  തള്ളിയ  നാവുമുള്ള  അവന്റെ    ഉറുമ്പരിച്ച ശവം മുനിസിപ്പൽ ജീവനക്കാർ    എടുത്തു മാറ്റിയ  അവസരത്തിൽ  .  അവൻ  കാലിയാക്കിയ ഇടം  മറ്റൊരുവൻ  കരസ്ഥമാക്കിയിട്ട്,  നന്മയുടെ  മറ്റൊരു മുഖത്തിന്റെ  കാലോച്ചയോർത്തു മൂടിപ്പുതച്ച് അവിടെ  കിടക്കാൻ  തുടങ്ങി .  ചാവാലിപ്പട്ടികൾ  അവരുടെ  പ്രവർത്തിയും  തുടർന്നു  കൊണ്ടേയിരുന്നു ......! 

Wrong Visa

In a poor zoo of India, a lion was frustrated as he was offered not more than 1 kg meat a day. The lion thought its prayers were answered when one US Zoo Manager the zoo and requested the zoo management to shift the lion to the US Zoo. The lion was so happy and started thinking of a central A/c environment, a goat or two every day and a US Green Card also. On its first day after arrival, the lion was offered a big bag, sealed very nicely for breakfast. The lion opened it quickly but was shocked to see that it contained a few bananas. Then the lion thought that may be they cared too much for him as they were worried about his stomach as he had recently shifted from India . The next day the same thing happened. On the third day again the same food bag of bananas was delivered. The lion was so furious, it stopped the delivery boy and blasted at him, 'Don't you know I am the lion.king of the Jungle, what's wrong with your management?, what nonsense is this?, why are you delivering bananas to me?' The delivery boy politely said, 'Sir, I know you are the king of the jungle but ... Did you know that you have been brought here on a monkey's visa. friends the Moral of the Story is that,it is Better to be a Lion in India than a Monkey elsewhere.

Saturday, January 9, 2016

सीताजी का हठ बना उनके कष्टों का कारण


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सीताजी का हठ बना उनके कष्टों का कारण


Published January 9, 2016



एक बार महाराज जनक की पुत्री सीता अपनी सखियों के साथ उद्यान में खेल रही थीं, वहां उन्हें नर और मादा तोते का जोड़ा बैठा दिखाई दिया। वे दोनों एक वृक्ष की डाल पर बैठे-बैठे एक बड़ी मनोहर कथा कह रहे थे। कथा कुछ इस तरह थी...

इस पृथ्वी पर श्रीराम नाम से प्रसिद्ध एक बड़े राजा होंगे। उनकी महारानी का नाम सीता होगा। श्रीराम बड़े बलवान और बुद्धिमान होंगे और उनके समस्त राजाओं को अपने अधीन कर सीताजी के साथ ग्यारह हजार वर्षों तक राज्य करेंगे। धन्य है सीता देवी और धन्य हैं श्री रामजी, जो एक दूसरे को पाकर इस लोक में आनंदपूर्ण विहार करेंगे।
तोते के मुंह से ऐसी बात सुनकर सीता ने सोचा कि कहीं ये दोनों पक्षी मेरे ही जीवन कथा तो नहीं कह रहे हैं। इन्हें पकड़कर क्यों न सभी बातें पूंछूं? ऐसा विचार कर उन्होंने अपने सेवकों से कहकर दोनों पक्षियों को चुपके से पकड़वा लिया। सीता ने उन दोनों से कहा कि तुम दोनों डरो मत, मैं सिर्फ यह जानना चाहती हूं कि तुम दोनों कौन हो? कहां से आए हो? राम कौन हैं और सीता कौन है? तुम्हें यह जानकारी कैसे मिली?

इतने सारे प्रश्न सुनकर दोनों तोते चौंक गए। तब दोनों कहा कि वाल्मीकि नाम के प्रसिद्ध बहुत बड़े ऋर्षि हैं। हम लोग उन्हीं के आश्रम में रहते हैं। उन्होंने एक बड़े ही सुंदर काव्य की रचना की है, जिसका नाम रामायण है। उनकी कथा बड़ी ही मनोहरणी है। महर्षि अपने शिष्यों को रामायण पढ़ाते हैं।
इस तरह वह तोते सीताजी को रामायण की कथा सुनाने लगे। कथा सुनने के बाद सीताजी ने कहा कि तुम जिस जनकनंदनी की बात कर रहे हो, वह मैं ही हूं। श्रीराम ने मेरे मन को अभी से आकर्षित कर दिया है। वे यहां आकर जब मुझे वरण करेंगे, तभी मैं तुम्हें छोडूंगी।

इसलिए जब तक श्रीराम नहीं आते, तब तक तुम दोनों यहां सुख से रहो और मीठे-मीठे फलों का उपभोग करो। यह बात सुनकर दोनों तोते डर गए। उन्होंने सीताजी से कहा कि हम लोग पेड़ों पर रहने वाले स्वच्छंद पक्षी हैं और मादा गर्भिणी है। इसलिए उसने कहा कि वह अपने बच्चों को जंगल में ही जन्म देना चाहती है।

उसने बहुत प्रार्थना की, लेकिन सीताजी नहीं मानीं। इस हठ के चलते मादा तोते ने राम-राम का उच्चारण करते हुए अपने प्राण त्याग दिए। उस मादा तोते के लिए स्वर्ग से एक विमान आया और वह दिव्य रूप धारण कर उस विमान के द्वारा स्वर्गलोक चली गई। पत्नी के वियोग में नर तोते ने भी अपने प्राण त्याग दिए।

कहते हैं कि सीता के विरह दुख का बीज उसी समय पड़ गया था, मादा गर्भिणी तोते ने प्राण त्‍याग दिए थे। इसी बैर का बदला लेने के लिए उस नर तोते ने अयोध्या में धोबी के रूप में जन्म लिया और उसके लांछन के कारण सीताजी को भी गर्भिणी की दशा में श्रीराम से अलग होना पड़ा था।






Thursday, January 7, 2016

युगन युगन हम योगी



Wednesday, January 6, 2016

अपना गुणरहित एवं विकल धर्म श्रेष्ठ है.....!

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌ ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥
भावार्थ :  अच्छी प्रकार आचरण में लाए हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित  एवं विकल भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है॥

 श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता3/35


Better is one's own duty, though devoid of merit , than the duty of another well discharged. Better is death in one's own duty. The duty ( Dharma) of another is fraught with fear.

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌॥

भावार्थ : - अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता॥
 श्रीमद्‍  भगवद्‍ गीता 18/47॥

Better is one's own duty ( Dharma) though destitute of merits, than the duty ( Dharma) of another well performed. He who does the duty ordained by his own nature in cures no sin.

 श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता- 6/11& 12 
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्‌ ॥
भावार्थ :-  शुद्ध भूमि में, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके॥11॥
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥
भावार्थ :-  उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे॥12॥